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गैर जिम्मेदाराना नीतियों से सरकार पर बदनुमा दाग साबित होती अस्थायी गौशालाये

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लखनऊ:रिपोर्ट अजय यादव:माल उत्तर प्रदेश की सत्ता में जिस भाजपा का आगमन गाय रक्षा, गाय सेवा , गाय माता , गाय मांस , गाय मूत्र,  के मूल मंत्र से हुई थी । उसी भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जिस प्रकार ग्राम पंचायतों में बने अस्थायी गौशालाओं में गाये भूख और ठंढी से तड़प कर दम तोड़ रही है। यह ह्रदयविदारक दृश्य देखकर समझना मुश्किल हो जाता है। इसका दोषी कौन है? आख़िर बलिबेदी पर ग्राम प्रधानों को चढ़ाया जाये , या अपराधी ग्राम विकास अधिकारियों को समझा जाये, या दोषी उन बेजुबान गौवंशीय को कहा जाये जिनके हिस्से मौत ही लिखी है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सरकार बनते ही किये गए वादे के अनुसार गौ माता के प्रति आस्था दिखाते हुये ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा गौ वंशीय पशुओं के लिए अस्थायी गौशालाओं का निर्माण कराया जिससे गौवंशीय पशुओं को दुर्व्यवहार और पशु तस्करों से सुरक्षा की जा सके।सरकार की दूरदर्शी सोच थी किसान की  आवारा पशुओं से नुकसान होती फ़सल से छुटकारा मिलेगा। मगर प्रशासन की गलत नीतियों से न तो गायों की सुरक्षा व्यवस्था हो पायी न ही किसान की आवारा पशुओं से बर्बाद होती फ़सल बचते दिख रही है। । जहाँ एक तरफ भाजपा सरकार गायों को माता का दर्जा देने की वकालत करती है वही दूसरी ओर इसी सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों की ग़लत नीतियों से सैकड़ों गौवंशीय पशु भूख और ठंड से काल के गाल में समाते जा रहे हैं। वही दूसरी तरफ सैकड़ों की संख्या में घुमन्तू पशुओं के द्वारा क्षेत्र के किसानों की फसलों को बर्बाद किया जा रहा है।
विकास खंड माल की ग्यारह न्याय पंचायतों माल, मड़वाना, बदैया , थरी , सिसवारा , ससपन , शंकरपुर , नबीपनाह ,  अमलौली ,  अटारी, और अऊमऊ की 21 पंचायतों में अस्थाई गौशालाओं के निर्माण के  लिए शासन ने मनरेगा से 122.31 लाख रुपये स्वीकृति किये । अधिकारियों ने आनन फानन में गौशालाओं को जमीनी स्तर पर रूप देना शुरू कर दिया विकास खण्ड की 21 पंचायतों में गौशाला निर्माण में 52.71 लाख रुपये मनरेगा तथा 28.25 लाख रुपये अन्य मद से खर्च करने के बावजूद  अधिकतर गौशालाओं में बदहाली व्याप्त है। कई पंचायतों में तो गौशालाओं के नाम पर केवल खाना पूर्ति की गई है। वही अधिकतर पंचायत की गौशालाओं में भी कार्य अभी आधे अधूरे ही पड़े है।सरकार की मंशा थी ग्रामीण क्षेत्रों में गौशालाओं के निर्माण से जहाँ किसानों की बर्बाद होती फ़सल आबाद होगी वही दूसरी तरफ गौवंशीय पशुओं को सुरक्षित जीवन दिया जा सकेगा ।
गुनाहगार अगर ग्राम प्रधान को बनाया जाये तो प्रति महीने गौशालाओं पर लाखों रुपये खर्च आता है। जबकि तीन- तीन महीने चारे  का पैसा लेट आता है । और महंगाई को देखते हुये प्रति जानवर 32 रुपये प्रतिदिन चारे और देखरेख के खर्च को नाकाफी बताते हुये हाथ खड़े करते नज़र आये। वहीं जिम्मेदार अगर अधिकारियों को ठहराया जाये तो सरकार द्वारा दिये जाने वाले बजट धनराशि में देरी को कारण बताकर जिम्मेदारियों से भागते नज़र आये। दोषी उन बेजुबान गौवंशीय पशुओं कहा जाये जो पहले छुट्टा होकर मांस के लिए पशु तस्करों के हाथ मरते थे। आज अस्थायी गौशालाओं में भूख और ठंड से इकट्ठे मारे जा रहे है।आवारा पशुओं से अपनी फ़सल की बर्बादी से परेशान किसान आज भी अपने खेतों पर लट्ठ लेकर जानवरों से रात दिन अपनी फसल की सुरक्षा करता नज़र आता है। वही दूसरी तरफ इन्ही आवारा पशुओं के हमले से सैकड़ो किसानों की या तो जाने चली गयी या गम्भीर रूप से घायल हो चुके है।अरबों रुपये अस्थायी गौशालाओं में खर्च करने बावजूद भी जब गौवंशीय पशुओं के मौत जारी है, आवारा पशुओं से किसान के फसलों की बर्बादी रूकने का नाम नही ले रही है। इस हालात में समझना मुश्किल हो जाता है कि आख़िर प्रशासन की कड़ियाँ कमजोर कहा से है। उच्चाधिकारियों की गैरजिम्मेदाराना नीतियाँ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नीतियों को पलीता तो नही लगा रही है।
डीआरएस न्यूज नेटवर्क

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